लाइफ में इतनी टेंशन है, कैसे भगवत प्राप्ति होगी. So much tension in life, how will one attain God?

Very beautiful answer of Maharaj Ji

SPRITUALITY

Dheeraj Kanojia

8/31/20233 min read

महाराज जी से एक भक्त ने सवाल किया. लाइफ में इतनी टेंशन है, कैसे भगवत प्राप्ति होगी.

महाराज जी का यह जवाब हमें सही और गलत की पहचान करता है. अगर हम उनकी यह बात माने तो हमारा जीवन संवर जाएगा. पढ़िए महाराज जी का जवाब. आपको जरूर लाभ मिलेगा.

सुनीत कुमार शर्मा जी जर्मनी से।

महाराज जी आपके चरणों में कोटी कोटी प्रणाम।

महाराज जी मैं गत 10 वर्षों से ग्रहस्थ जीवन का निर्वाह करते हुए विदेश में रह रहा हूँ। बचपन से ही पूजा पाठ में रुचि है। श्रीजी की कृपा होने पर इस बार वृंदावन, धाम, आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महाराज जी ग्रस्त जीवन एवं नौकरी की इच्छा मन को जल्द ही विचलित कर देती है। जीवन चक्रव्यू जैसा प्रतीत होने लगता है। मन बार बार संसारिक विषयों की ओर ही भागता है। कई प्रकार के संदेह पैदा होने लगते है। जैसे कि क्या ग्रहस्थ जीवन में भगवत प्राप्ति होगी या नहीं होगी?

महाराज जी का बहुत सुन्दर जवाब

आपने सत्संग नहीं सुना। इसका तो सैकड़ो बार उत्तर हुआ है। आपको फिर सरल भाव से बता देते हैं।

आप यह स्वीकार करते हैं। यह सृष्टि श्री भगवान की है?

आप यह स्वीकार करते हैं। आपके पास जो कुछ भी है, शरीर से लेकर मन से लेकर बाहरी व्यवहार तक। वो भगवान का दिया हुआ है?

आप स्वीकार करते है की आपको जो सेवा, मिली, नौकरी या व्यापार हो। वो भगवान की ही सृष्टि में और भगवान के द्वारा दिया हुआ है।

अब आप उसको भगवान को समर्पित कर दीजिये.

जैसे हम भोग बनाते है. हमने भगवान को समर्पित कर दिया और पाते हम हैं। अब वो प्रसाद हो गया और उसका पुण्य लाभ हो गया।

पैसा अपने पास रखो। परिवार तुम्हारा ही है। पर मान्यता तुम्हारी भगवान के प्रति होनी चाहिए.

जो आप काम कर रहे है, उसे भगवान को समर्पित करते जाओ।

भगवान से प्रार्थना करो.

आज 8 घंटे जो काम किया प्रभु उसमे जो भी आपका स्मरण हुआ या विस्मरण हुआ वो 8 घंटे आपके चरणों में समर्पित है.

पत्नी पुत्र परिवार के रूप में। जो आपने सेवा दी, सेवा में रत हैं। आपका आनंद चिंतन नहीं हो पाता? पर इतना जरुर पता है की आपके लिए ही ये सब सेवा है। आप इन रूपों में प्रसन्न हुये प्रभु। आप इन रूपों में आये.

सब काम प्रभु को समर्पित कर दो.

जितना आप जानते हैं कि ये धर्म है उसी में चलो। जितना जानते है अधर्म है। उसको बिल्कुल मत करो.

नाम करते रहो.

जो एक महात्मा की गति होती है। वही आपकी गति होगी।

अब इसमें परेशानी क्या आती है.

अब आप करो मनमानी आचरण तो आप कैसे उस परम, पवित्र, परमात्मा को प्राप्त हो सकते हैं.

बस ये बात हम सब से चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं, नाम जप करते हुए जो भी कर्म करते हो वो कर्तव्य कर्म हो। अधर्म आचरण न हो, भगवान को समर्पित कर दो.

कोई ऐब न करो। जहाँ हो वही भगवत प्राप्त हो जाओगे। क्योंकि आप भगवान के हैं। आपके भगवान हैं। ये बात समझने के लिए आपका अंत करण पवित्र चाहिए।

लेकिन गन्दे आचरण इतने चल गए हैं, रौशनी 4 दिन की है। इसके बाद जो अंधेरी रात आयेगी फिर तुम्हें समझ में आ जाएगा। कल के सत्संग में। विदुर जी महाराज कह रहे है की ऐसे लोगो की आयु नष्ट हो जाती है। जो शराब पीते हैं. मांस खाते हैं। व्यभिचार करते हैं.

किसी को विश्वास दिला कर के उनकी पत्नी के साथ। फिर दोष वृत्ति रखते हैं। ऐसे लोगों की आयु नष्ट हो जाती है। श्री नष्ट हो जाती है। और उनका सुकृत नष्ट हो जाता है। अकाल मृत्यु को प्राप्त होते है।

मतलब हम अगर गंदे आचरण करे। तो फिर कैसे भगवत प्राप्ति होगी और अच्छे आचरण जो हमारे धर्म के अनुकूल है। निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

बाबा जी केवल बनने से भगवत प्राप्ति हो जाएगी, ऐसा हमने कहीं नहीं लिखा पाया

भगवत स्मरण करने से, भगवत आज्ञा पालन से, अपने धर्म का पालन करने से भगवत प्राप्ति हो जाती है।

हमारा विरक्त धर्म है। आपका ग्रस्त। दोनो तो एक पिता के पुत्र हैं।

दोनों को अलग अलग सेवाएं दी गयी है। लेकिन उसी की सेवा बस ये मान के करो।

मगर आप से गलती कहा होती है.

आप भगवान् की सेवा नहीं मानते। आप अपना परिवार मानते है. आप अपनी पत्नी मानते हैं. आप अपनी संपत्ति मानते है। आप अपने अहम के द्वारा कर्ता भोक्ता बनते है। इसलिए आप इन रिश्तो में बंध जाते है.

आप बंधन को स्वीकार किए हुए है इसलिए बंधे हुए हैं।

आप स्वीकार करे, कोई बंधन नहीं। सबमें वही। प्रभु विराजमान है। वह आपको सेवा दे रहा है। आप उनको सेवा दे रहे है.

आप सेवा कीजिये। पुत्र को पुत्र भाव से।

पत्नी को पत्नी की जगह.

ऐसे ही माता पिता भाई बंधू जिससे जो सेवा व्यवहार, नौकरी में सत्य और धर्म से चलो

संयमी पुरुष बनो.

अपने आप आपको आनंद अनुभव होगा। ये भ्रम हट जाएगा कि मुझे भगवान मिलेंगे या नहीं मिलेंगे।

आप भगवान में ही खेलेंगे।

अब आप अधर्माचरण करो। फिर दान पुन्य करो या चाहे गंगा नहालो

तुम्हारी वृत्ति दोषी थी इसलिए लाभ नहीं मिल पायेगा।

सच्ची बात है, कभी कोई किसी तीर्थ न गया हो, अगर वह धर्म से चले। अपनी पत्नी में। अनुराग रखे। पराई माता, बहनों की तरफ। पवित्र दृष्टि रखे। मदिरा ना पिए.

गंदी बातें न करे। जितना बन सके। उतना नाम जप कर ले। वो भगवान की कृपा का पात्र भगवान को प्राप्त हो जाए

हम आपको ये अंदर की बात बता रहे है.

हमारे भगवान। इतने कृपालु है, पूछो मत पर हम लोग खुद ऐसी गलतियां कर बैठते है। इतनी बड़ी बड़ी और जान बूझ कर करते हैं. तो फिर हमारी वृत्ति ही नहीं रहती। भगवान ने गीता जी में कहा।

चेतशवसायात्मिका बुद्धि समाध।

जिसकी चितवृत्ति ऐसे भोगों में फँसी हुई है।

उसकी बुद्धि निश्चय ही नहीं कर सकती कि उसे भगवत प्राप्ति करनी है या नहीं.

हमको भगवान के प्रति विश्वास रखना चाहिए। अगर हमसे गलती भी हो जाए तो? निराश नहीं होना।

भगवान बड़े कृपालु है. अगर तुम उनका नाम स्मरण करोगे और फिर पापाचरण नहीं करोगे तो अवश्य भगवत्प्राप्ति हो जायेगी.

वीडियो पर क्लिक करे https://youtu.be/2Q8sKIdv_gU?si=XIY9y9VfSBBmXndT

Millions of salutations at your feet Maharaj ji.

Maharaj ji, I have been living abroad for the last 10 years leading a household life. Interested in worship lessons since childhood. Due to the grace of Shreeji, I got the good fortune to visit Vrindavan, Dham this time. Maharaj ji's suffering life and the desire for a job quickly distracts the mind. Life seems like a cycle. The mind again and again runs towards worldly matters. Many types of doubts start arising. For example, will there be attainment of God in earthly life or not?

Very nice answer maharaj ji

You didn't listen to the satsang. This has been answered hundreds of times. Let me tell you again in a simple way.

You accept this. Is this creation of Shri Bhagwan?

You accept this. Everything you have, from body to mind to external behavior. Is it given by God?

You accept the service, job or business you receive. It is in God's creation and given by God.

Now you dedicate it to God.

Like we make bhog. We surrender to God and we get it. Now it has become Prasad and its virtue has been benefited.

Keep the money with you. The family is yours. But recognition should be towards your God.

Keep dedicating the work you are doing to God.

Pray to God.

Lord, whatever work i did for 8 hours today, whatever i remembered or forgot, remained at your feet for 8 hours is devoted.

Wife and son as family. Those who have served you are engaged in service. Can't contemplate your joy? But it is definitely known that all this service is for you only. Lord, you were pleased in these forms. You came in these forms.

Dedicate all work to God.

Follow the Dharma as much as you know it. As much as we know is unrighteous. Don't do that at all.

Keep naming.

Which is the pace of a Mahatma. That will be your speed.

Now what is the problem with it.

Now if you behave arbitrarily then how can you attain that supreme, holy, God.

Just shout this thing to all of us, whatever work you do while chanting the name, it should be a duty of God. There should be no unrighteous behavior, dedicate it to God.

Don't do anything. You will find God wherever you are. Because you belong to God. is your god. To understand this, your conscience needs to be pure.

But the dirty practices have become so prevalent that there is only 4 days of light. After this, the dark night that will come, then you will understand. In tomorrow's satsang. Vidur ji Maharaj is saying that the age of such people is destroyed. who drink alcohol. eat meat. commit adultery.

By convincing someone and with his wife. Then they have an attitude of blame. The age of such people is destroyed. Shree gets destroyed. And their good fortune gets destroyed. Dies untimely death.

Meaning if we behave dirty. Then how to attain God and good conduct which is in favor of our religion. You will definitely attain God.

We could not find anywhere written that by simply becoming Babaji, God will be attained.

By remembering God, by obeying God's orders, by following one's religion, one attains God.

We have a detached religion. Yours. obsessed. Both are sons of one father.

Different services have been provided to both. But serve him with just this respect.

But where is your mistake?

You do not accept the service of God. You consider your family. You consider your wife. You consider it your property. You become a doer and enjoyer through your ego. That's why you get tied into these relationships.

You have accepted bondage, therefore you are bound.

You accept, there is no restriction. Same in everything. The Lord is seated. He is serving you. You are providing them a service.

You serve. To the son as a son.

To wife instead of wife.

In the same way, parents and brothers, from whom they should follow truth and religion in their service behavior and job.

Be a restrained man.

You will automatically feel happy. This illusion will be removed whether I will find God or not.

You will play only in God.

Now you commit unrighteousness. Then do charity or take a bath in the Ganga.

Your attitude was guilty, so there was no profit.

The truth is, no one has ever gone to any pilgrimage, if they follows Dharma. they surely attain God.

Do not drink alcohol. Don't talk dirty. As much as possible Chant that much name. May that deserving of God's grace be received by God.

We are telling you this inside story.

Our Lord He is so kind, don't ask but we ourselves make such mistakes. They do it in such a big way and on purpose. Then our attitude doesn't remain. God said in Geeta ji.

Chetashvasayatmika Buddhi Samadha.

Whose mind is engrossed in such pleasures.

We should have faith in God. Even if we make a mistake? Don't be disappointed.

God is very kind. If you remember his name and then don't commit sinful acts, you will surely attain God.