जीवन में क्यों होता है Stress, मूल कारण और बचने का उपाय

Why does stress occur in life, its root cause and ways to avoid it

SPRITUALITY

महाराज जी Bhajan marg you tube channel

7/10/20241 min read

जीवन में क्यों होता है Stress, मूल कारण और बचने का उपाय

जीवन में तनाव होने का मूल कारण अज्ञान हैं। अज्ञान मन से हमारे अंदर कामनाएं उत्पन्न होती है और कामनाएं पूरी नहीं होने पर हमारे अंदर असंतुष्टता आती है। कामनाओं की पूर्ति नहीं होने पर क्रोध आता है और यह हमारी स्मृर्ति को छिनता है। स्मृर्ति में मूढ़ता आती है और बुद्धि नष्ट हो जाती है। इससे तनाव होता है, जिसे डिप्रेषन कहते है।

विषयों (अमुख अमुख चीजों की कामनाएं) का चिंतन नाष की जड़ है। रूपयाा क्यों प्रिय है क्योंकि उससे भोगने के लिए विषय सामग्री मिलती है। और यह सब विषय सामग्री जिसके पास सब है, वो भी क्यों परेषान है, उसको क्यों संतुष्टि नहीं हो पा रही है। इसका मतलब हमें अज्ञानता के ड्रामें में फंसाया गया है।

कैसे खुद को बचाएं

महाराज जी कहते है, इस ड्रामें से हमें निकलना होगा। उसके लिए अध्यात्म चाहिए। हम आपको कामनाओं और विषयों को छोड़ने के लिए कहेंगे तो आप ऐसा सुनते ही डर जाओंगे, सोचेंगे कि इसे छोड़ेंगे तो यह जीवन किस काम का। हम कहते है, भोगो, लेकिन धर्मपूर्वक भोगो। धर्म एक सीमा में बांध देता है, जैसे तुम्हे यह खाना है, यह पीना है, तुम्हारी यह पत्नी है वगैरह वगैरह। बस एक सीमा में रहो। नाम जप करो और धर्मपूर्वक भोगो तो निकल जाओंगे, फंसोंगे नहीं।

पर होता क्या है

लेकिन आपका मन इस सीमा में राजी नहीं है। आपके मन को तो नया नया चाहिए और इसलिए पाप हो जाता है। इसी अज्ञान की वजह से हमारी दुर्गति हो जाती है।

ऐसे भागेगा Stress

नया नया तो सिर्फ भगवान है। मन विश्राम बिना भगवान को नहीं मिलेगा। इसलिए हमारी प्रार्थना है कि पहले गंदे दृष्य देखना बंद करो। गंदी बाते बोलना बंद करो। गंदी क्रियाएं करना बंद करो। तब तुम्हारे गंदे विचार छुट जाएंगे। और गंदे विचार छूटे और पोजिटिव हुए तो आप हर परीस्थिति में आनंदित रहोंगें। अगर हमारे विचार सही है तो परीस्थिति हमें दुख नहीं दे सकती। जिसे सुख चाहिए उसे कष्ट होता है और जो सुख में स्थित है उसे कष्ट क्या पहुंचेगा। थोड़ी सी सुन्न वाली दवा कष्ट नहीं होने देती और चित्त भगवान को दे दंेगे तो क्या कष्ट होगा। बड़े से बड़े कष्ट हंसके सह लेते है। तुम्हारा दिमाग स्वस्थ हो और षरीर भले स्वथ न हो तो क्या परेषानी है। भगवान का भरोसा होना चाहिए। बिना अध्यात्म बल जागृत हुए मन को विश्राम नहीं मिलेगा। अगर आप नाम जप करने लगो, सत षास्त्रों का स्वध्याय करो, सत्संग सुनो, माता पिता बड़े बुढ़ों की सेवा करो, समाज को सुख पहुंचाओ अभी आप प्रसन्न होने लगोंगे। अब अपने सुख के विषय में इतना ज्यादा सोच सोच कर हम परेषान हो जाते है। सबसे ज्यादा मनुष्य ओवर थिकिंग से परेषान है। सामने भोजन रखा है उसका आनंद नहीं ले रहे, लेकिन वह परसो के लिए परेषान है। हम कह रहे है, जिसने आज संवारा है वो कल भी संवारेगा। पर उससे (भगवान से) तुम्हारा परिचय नहीं है, अपनापन नहीं है, इसलिए तुम परेषान हो रहे हो।